मनकबत ख्वाजा गरीब नवाज़ रदिअल्लाहो तआला अन्हो।
बहरे ज़ुल्मत में तुम एक जज़ीरा ख्वाजा,
बीच मंझधार में तुम एक किनारा ख्वाजा।
मैंने मीरास में पायी है ग़ुलामी आक़ा,
तीस पुश्तों से मैं नौकर हूँ तुम्हारा ख्वाजा।
वालिये हिन्द यहाँ हिन्द में मुश्किल हैं बहुत,
फ़ज़ले रब्बी से हो तुम मेरा सहारा ख्वाजा।
न कोई पहले से मनसूबा न दावत कोई,
तुमने अजमेर मुझे खूब बुलाया ख्वाजा।
हिन्द में आप हैं सौगात-ए-रसूल-ए-अरबी,
हर तरफ अबरे करम आपका छाया ख्वाजा।
आरजू है के मैं फिर चाँद रजब का देखूँ,
फिर बुलाने का करूँ तुमसे तक़ाज़ा ख्वाजा।
अशरफ़ क़ादरी बेजोड़ है बेज़ोम नहीं,
ग़ौस का हूँ तो तुम्हारा हूँ तुम्हारा ख्वाजा।
( सरकार शरफ़-ए-मिल्लत अश्शाह अशरफ़ मियाँ क़ादरी बरकाती मारहरा शरीफ़ )
Subhnallah
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